श्री आदिनाथ चालीसा
🕉️

श्री आदिनाथ चालीसा

Shri Aadinath ChalisaShri Aadinath Chalisa praises Aadinath, the first Tirthankara, highlighting his wisdom and teachings. Devotees recite it to honor his spiritual guidance.
🕉
॥ दोहा॥ शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन को, करूं प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम ॥सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार । आदिनाथ भगवान को, मन मन्दिर में धार ॥ ॥ चौपाई ॥ जै जै आदिनाथ जिन स्वामी । तीनकाल तिहूं जग में नामी ॥ वेष दिगम्बर धार रहे हो । कर्मो को तुम मार रहे हो ॥ हो सर्वज्ञ बात सब जानो । सारी दुनियां को पहचानो ॥ नगर अयोध्या जो कहलाये । राजा नाभिराज बतलाये ॥4॥ मरुदेवी माता के उदर से । चैत वदी नवमी को जन्मे ॥ तुमने जग को ज्ञान सिखाया । कर्मभूमी का बीज उपाया ॥ कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने । जनता आई दुखड़ा कहने ॥ सब का संशय तभी भगाया । सूर्य चन्द्र का ज्ञान कराया ॥8॥ खेती करना भी सिखलाया । न्याय दण्ड आदिक समझाया ॥ तुमने राज किया नीति का । सबक आपसे जग ने सीखा ॥ पुत्र आपका भरत बताया । चक्रवर्ती जग में कहलाया ॥ बाहुबली जो पुत्र तुम्हारे । भरत से पहले मोक्ष सिधारे ॥12॥ सुता आपकी दो बतलाई । ब्राह्मी और सुन्दरी कहलाई ॥ उनको भी विध्या सिखलाई । अक्षर और गिनती बतलाई ॥ एक दिन राजसभा के अंदर । एक अप्सरा नाच रही थी ॥ आयु उसकी बहुत अल्प थी । इसलिए आगे नहीं नाच रही थी ॥16॥ विलय हो गया उसका सत्वर । झट आया वैराग्य उमड़कर ॥ बेटो को झट पास बुलाया । राज पाट सब में बंटवाया ॥ छोड़ सभी झंझट संसारी । वन जाने की करी तैयारी ॥ राव हजारों साथ सिधाए । राजपाट तज वन को धाये ॥20॥ लेकिन जब तुमने तप किना । सबने अपना रस्ता लीना ॥ वेष दिगम्बर तजकर सबने । छाल आदि के कपड़े पहने ॥ भूख प्यास से जब घबराये । फल आदिक खा भूख मिटाये ॥ तीन सौ त्रेसठ धर्म फैलाये । जो अब दुनियां में दिखलाये ॥24॥ छै: महीने तक ध्यान लगाये । फिर भजन करने को धाये ॥ भोजन विधि जाने नहि कोय । कैसे प्रभु का भोजन होय ॥ इसी तरह बस चलते चलते । छः महीने भोजन बिन बीते ॥ नगर हस्तिनापुर में आये । राजा सोम श्रेयांस बताए ॥28॥ याद तभी पिछला भव आया । तुमको फौरन ही पड़धाया ॥ रस गन्ने का तुमने पाया । दुनिया को उपदेश सुनाया ॥ पाठ करे चालीसा दिन । नित चालीसा ही बार ॥ चांदखेड़ी में आय के । खेवे धूप अपार ॥32॥ जन्म दरिद्री होय जो । होय कुबेर समान ॥ नाम वंश जग में चले । जिनके नहीं संतान ॥ तप कर केवल ज्ञान पाया । मोक्ष गए सब जग हर्षाया ॥ अतिशय युक्त तुम्हारा मन्दिर । चांदखेड़ी भंवरे के अंदर ॥36॥ उसका यह अतिशय बतलाया । कष्ट क्लेश का होय सफाया ॥ मानतुंग पर दया दिखाई । जंजीरे सब काट गिराई ॥ राजसभा में मान बढ़ाया । जैन धर्म जग में फैलाया ॥ मुझ पर भी महिमा दिखलाओ । कष्ट भक्त का दूर भगाओ ॥40॥ ॥ सोरठा ॥ पाठ करे चालीसा दिन, नित चालीसा ही बार । चांदखेड़ी में आय के, खेवे धूप अपार ॥ जन्म दरिद्री होय जो, होय कुबेर समान । नाम वंश जग में चले, जिनके नहीं संतान ॥

प्रिंट योग्य बोल चित्र

वैकल्पिक। प्रिंट, साझा करने और छवि खोज के लिए उपयोगी।
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण में भी उपलब्ध